🛒 छोटे शहरों पर फोकस करने वाली CityMall का रेवेन्यू ₹500 करोड़ के पार,

CityMall

गुरुग्राम बेस्ड ग्रोसरी-लेड ई-कॉमर्स स्टार्टअप CityMall ने वित्त वर्ष 2025 में 25% की सालाना वृद्धि दर्ज करते हुए अपना ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹500 करोड़ के पार पहुंचा दिया है। हालांकि स्केल में मजबूत बढ़ोतरी के बावजूद कंपनी का घाटा अभी भी बरकरार है।

Registrar of Companies (RoC) से प्राप्त स्टैंडअलोन वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार, FY25 में कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹534 करोड़ रहा, जो FY24 में ₹427 करोड़ था।


📦 सोशल कॉमर्स से ग्रोसरी-लेड मॉडल की ओर शिफ्ट

साल 2019 में स्थापित CityMall ने शुरुआत में सोशल कॉमर्स मॉडल अपनाया था, जिसमें कम्युनिटी रिसेलर्स के जरिए टियर-2 और टियर-3 शहरों में प्रोडक्ट बेचे जाते थे। अब कंपनी ने अपनी रणनीति बदलते हुए ग्रोसरी-लेड मॉडल पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है, साथ ही प्राइवेट लेबल प्रोडक्ट्स पर भी फोकस बढ़ाया है।

कंपनी लाइफस्टाइल, ग्रोसरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आवश्यक उत्पादों की बिक्री करती है।


💰 96% कमाई प्रोडक्ट सेल्स से

CityMall की कुल ऑपरेटिंग इनकम में से लगभग 96% हिस्सा सीधे प्रोडक्ट सेल्स से आता है। FY25 में प्रोडक्ट सेल्स से रेवेन्यू 30% बढ़कर ₹512 करोड़ हो गया।

बाकी इनकम लॉजिस्टिक्स और मार्केटिंग सेवाओं से आई।

📊 कौन-से प्रोडक्ट सबसे ज्यादा बिके?

  • आटा, चीनी, तेल और घी: ₹210 करोड़ (कुल प्रोडक्ट सेल्स का 39%)
  • ब्रांडेड फूड और बेवरेज: ₹85 करोड़
  • होम और पर्सनल केयर: ₹58 करोड़
  • अन्य स्टेपल्स और मिक्स प्रोडक्ट्स: ₹159 करोड़

यह आंकड़े बताते हैं कि कंपनी का फोकस डेली-यूज ग्रोसरी पर ज्यादा है, जो छोटे शहरों में स्थिर मांग वाला सेगमेंट है।


📈 कुल आय ₹551 करोड़ तक पहुंची

कंपनी को डिपॉजिट और निवेश पर ब्याज से ₹17 करोड़ की अतिरिक्त आय भी हुई। इसके बाद FY25 में कुल आय ₹551 करोड़ रही, जो FY24 में ₹460 करोड़ थी।


📉 खर्च भी तेजी से बढ़े

हालांकि रेवेन्यू में बढ़ोतरी हुई, लेकिन खर्चों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

🧾 प्रमुख खर्च

  • प्रोडक्ट खरीद लागत: ₹510 करोड़ (कुल खर्च का 72%) — 31% वृद्धि
  • कर्मचारी लाभ खर्च: ₹82 करोड़ (10% की गिरावट)
    • इसमें ₹16.5 करोड़ ESOP खर्च शामिल
  • ट्रांसपोर्टेशन लागत: ₹56 करोड़ (स्थिर)
  • अन्य खर्च (किराया, क्लाउड, होस्टिंग, इन्वेंट्री प्रावधान): ₹65 करोड़

कुल मिलाकर FY25 में कंपनी का कुल खर्च 15% बढ़कर ₹710 करोड़ हो गया।


🔴 घाटा जस का तस

Accel समर्थित Accel द्वारा निवेशित CityMall का घाटा लगभग स्थिर रहा।

  • FY25 घाटा: ₹159 करोड़
  • FY24 घाटा: ₹156 करोड़

हालांकि EBITDA मार्जिन में सुधार हुआ और यह -30.3% पर पहुंच गया, लेकिन ROCE गिरकर -57.46% हो गया।

यानी कंपनी अभी भी स्केल हासिल करने के बावजूद प्रॉफिटेबिलिटी की राह पर संघर्ष कर रही है।


📊 यूनिट इकॉनॉमिक्स और बैलेंस शीट

FY25 में कंपनी ने ₹1 कमाने के लिए ₹1.33 खर्च किए। यह दर्शाता है कि ऑपरेटिंग एफिशिएंसी में सुधार की अभी भी गुंजाइश है।

मार्च 2025 के अंत तक कंपनी के पास:

  • कुल करंट एसेट्स: ₹368 करोड़
  • कैश और बैंक बैलेंस: ₹57 करोड़

💵 अब तक $157 मिलियन से ज्यादा फंडिंग

CityMall ने अब तक $157 मिलियन से अधिक की फंडिंग जुटाई है। हाल ही में कंपनी ने $47 मिलियन की Series D फंडिंग जुटाई थी, जिसका नेतृत्व Accel ने किया।

इस राउंड में शामिल अन्य निवेशक थे:

  • Waterbridge Ventures
  • Elevation Capital
  • Norwest Venture Partners
  • General Catalyst

🔍 आगे की रणनीति क्या?

CityMall का फोकस अब स्पष्ट रूप से छोटे शहरों में मजबूत सप्लाई चेन और प्राइवेट लेबल ग्रोसरी ब्रांड बनाने पर है। सोशल कॉमर्स मॉडल की तुलना में ग्रोसरी-लेड अप्रोच ज्यादा स्थिर और दोहराने योग्य रेवेन्यू मॉडल प्रदान करता है।

हालांकि, कंपनी को प्रॉफिटेबिलिटी तक पहुंचने के लिए:

  • प्रोक्योरमेंट कॉस्ट को कंट्रोल करना होगा
  • लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी बढ़ानी होगी
  • प्राइवेट लेबल मार्जिन सुधारने होंगे

📌 बड़ी तस्वीर

भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में ई-कॉमर्स की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। लेकिन इस मार्केट में टिके रहने के लिए सिर्फ ग्रोथ नहीं, बल्कि मजबूत यूनिट इकॉनॉमिक्स भी जरूरी हैं।

CityMall ने स्केल तो हासिल कर लिया है, लेकिन अब असली परीक्षा प्रॉफिटेबिलिटी की है।

FY25 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि कंपनी सही दिशा में कदम बढ़ा रही है, लेकिन घाटे को कम करना और स्थायी मुनाफा कमाना ही इसके अगले चरण की असली चुनौती होगी।

अगर कंपनी अपने खर्चों पर काबू पाती है और ग्रोसरी-लेड मॉडल को और मजबूत करती है, तो आने वाले वर्षों में यह छोटे शहरों की ई-कॉमर्स रेस में एक अहम खिलाड़ी बन सकती है। 🚀

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Euler Motors

इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में तेजी से उभर रही दिल्ली बेस्ड स्टार्टअप Euler Motors अब अपने अगले ग्रोथ फेज की तैयारी में जुट गई है। कंपनी करीब ₹220 करोड़ (लगभग 25 मिलियन डॉलर) का कर्ज (Debt) जुटाने जा रही है, जिसे एक या उससे अधिक ट्रांच में पूरा किया जाएगा।

यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब कंपनी ने नौ महीने पहले ही अपनी Series D फंडिंग राउंड में ₹638 करोड़ जुटाए थे। यानी इक्विटी के बाद अब कंपनी डेट फंडिंग के जरिए अपने ऑपरेशंस को और मजबूत करना चाहती है।


💰 पहली ट्रांच में ₹105 करोड़ जुटाने की तैयारी

RoC (Registrar of Companies) से प्राप्त नियामकीय फाइलिंग के अनुसार, कंपनी पहली ट्रांच में ₹105 करोड़ (लगभग $11.6 मिलियन) जुटा रही है। यह राशि नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) के माध्यम से उठाई जाएगी।

इस डेट राउंड को लीड कर रही है BlackSoil Capital, जबकि Trifecta Venture भी इसमें भाग ले रही है।

बोर्ड ने 10,500 NCDs जारी करने के लिए विशेष प्रस्ताव पारित किया है, जिनकी प्रति यूनिट कीमत ₹1,00,000 रखी गई है।

  • BlackSoil Capital का निवेश: ₹75 करोड़
  • Trifecta Venture का निवेश: ₹30 करोड़
  • कुल पहली ट्रांच: ₹105 करोड़

आगे की ट्रांच मिलाकर कुल डेट रेज़ ₹220 करोड़ तक पहुंच सकता है।


📊 फंड का उपयोग कहां होगा?

कंपनी ने फाइलिंग में बताया है कि इस डेट फंडिंग का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए किया जाएगा:

  • वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने में
  • कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex)
  • पुराने कर्ज का रीफाइनेंसिंग
  • अन्य सामान्य कॉरपोरेट जरूरतें

स्पष्ट है कि कंपनी अपने मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशनल स्केल को मजबूत करने के साथ-साथ बैलेंस शीट को भी बेहतर बनाना चाहती है।


🚚 2018 में हुई शुरुआत, EV थ्री-व्हीलर पर फोकस

साल 2018 में लॉन्च हुई Euler Motors कमर्शियल इलेक्ट्रिक वाहनों, खासकर इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स के उत्पादन में विशेषज्ञता रखती है।

कंपनी एक एसेट-हेवी मॉडल पर काम करती है, जिसमें:

  • वाहन निर्माण
  • फाइनेंसिंग पार्टनरशिप
  • आफ्टर-सेल्स सर्विस सपोर्ट

तीनों को मिलाकर एक इंटीग्रेटेड सिस्टम तैयार किया गया है।

Euler Motors खासतौर पर ई-कॉमर्स, हाइपरलोकल डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स फ्लीट ऑपरेटरों को टारगेट करती है। कार्गो-फोकस्ड EV सॉल्यूशंस के जरिए कंपनी लास्ट-माइल डिलीवरी मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।


🤝 मजबूत निवेशकों का साथ

स्टार्टअप डेटा प्लेटफॉर्म TheKredible के अनुसार, कंपनी अब तक $200 मिलियन से ज्यादा की फंडिंग जुटा चुकी है।

इसके प्रमुख निवेशकों में शामिल हैं:

  • Hero MotoCorp
  • GIC
  • British International Investment

मई 2025 में कंपनी ने अपनी Series D राउंड में ₹638 करोड़ जुटाए थे, जिसने इसके विस्तार प्लान को गति दी।


📈 FY25 में राजस्व बढ़ा, घाटा घटा

फाइनेंशियल प्रदर्शन की बात करें तो कंपनी ने FY25 में 12% की सालाना ग्रोथ दर्ज की।

  • FY25 राजस्व: ₹192.26 करोड़
  • FY24 राजस्व: ₹170.82 करोड़

सिर्फ रेवेन्यू ही नहीं, कंपनी ने घाटे में भी कमी दर्ज की है।

  • FY25 घाटा: लगभग ₹200 करोड़
  • FY24 की तुलना में 12% की कमी

हालांकि कंपनी अभी भी घाटे में है, लेकिन लॉस में कमी यह संकेत देती है कि ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार हो रहा है।


🔍 डेट फंडिंग क्यों महत्वपूर्ण है?

EV सेक्टर में मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की जरूरत होती है। एसेट-हेवी मॉडल अपनाने वाली कंपनियों के लिए डेट फंडिंग बैलेंस्ड ग्रोथ का एक अहम माध्यम बनती जा रही है।

इक्विटी फंडिंग के जरिए वैल्यूएशन बढ़ाने के बाद, अब कंपनी डेट के माध्यम से अपने ऑपरेशंस को स्केल करना चाहती है ताकि शेयरहोल्डर्स की हिस्सेदारी डाइल्यूट न हो और कैश फ्लो बेहतर बना रहे।


🚀 आगे की राह

भारत में कमर्शियल EV मार्केट तेजी से विकसित हो रहा है। सरकारी प्रोत्साहन, बढ़ती ई-कॉमर्स डिमांड और सस्टेनेबिलिटी पर फोकस के कारण इस सेगमेंट में अपार संभावनाएं हैं।

Euler Motors का यह नया डेट राउंड दर्शाता है कि कंपनी अपने प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और सर्विस नेटवर्क को मजबूत करने के लिए तैयार है।

यदि कंपनी राजस्व वृद्धि और घाटे में कमी की इस गति को बरकरार रखती है, तो आने वाले वर्षों में यह EV कमर्शियल सेगमेंट में एक मजबूत दावेदार बन सकती है।

फिलहाल, निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि ₹220 करोड़ का यह कर्ज कंपनी की ग्रोथ स्टोरी को कितनी मजबूती देता है और क्या यह भविष्य में संभावित IPO की दिशा में भी एक कदम साबित होता है।

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Klassroom

Edtech सेक्टर से एक बड़ी खबर सामने आई है। Klassroom ने अपना Draft Red Herring Prospectus (DRHP) भारतीय पूंजी बाजार नियामक Securities and Exchange Board of India (SEBI) के पास दाखिल कर दिया है। कंपनी Bombay Stock Exchange (BSE) के SME प्लेटफॉर्म पर अपना Initial Public Offering (IPO) लॉन्च करने की योजना बना रही है।

यह कदम ऐसे समय में आया है जब edtech सेक्टर फंडिंग स्लोडाउन के लंबे दौर के बाद धीरे-धीरे रिकवरी की ओर बढ़ रहा है। Klassroom का IPO प्लान इस बात का संकेत देता है कि निवेशकों का भरोसा फिर से उभर रहा है — खासकर उन कंपनियों पर जो ग्रोथ के साथ-साथ प्रॉफिटेबिलिटी भी दिखा रही हैं।


💰 IPO में क्या होगा खास?

कंपनी द्वारा दाखिल DRHP के अनुसार, प्रस्तावित IPO में दो हिस्से होंगे:

1️⃣ Fresh Issue – नए इक्विटी शेयर जारी किए जाएंगे
2️⃣ Offer for Sale (OFS) – कुछ मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर आंशिक रूप से बेच सकेंगे

Fresh issue से मिलने वाली राशि का उपयोग कंपनी कई रणनीतिक उद्देश्यों के लिए करेगी:

  • मौजूदा कर्ज (Debt) का भुगतान
  • Technology stack को मजबूत करना
  • AI/ML capabilities का विस्तार
  • कंटेंट डेवलपमेंट
  • मार्केटिंग और ब्रांड बिल्डिंग

वहीं OFS के जरिए कुछ प्रमोटर्स और शुरुआती निवेशक अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेच सकेंगे।


🏢 Public Company में बदली पहचान

Klassroom ने नवंबर पिछले साल खुद को पब्लिक लिमिटेड कंपनी में कन्वर्ट किया था। यह IPO की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम था। SME प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग से कंपनी को पूंजी जुटाने के साथ-साथ ब्रांड वैल्यू और निवेशक विश्वास भी मिलेगा।


🎓 Hybrid Learning Model पर दांव

2016 में स्थापित Klassroom एक Hybrid Learning Ecosystem पर काम करती है। इसका मॉडल ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों को मिलाकर बनाया गया है।

कंपनी का फोकस मुख्य रूप से क्लास 8 से 12 तक के छात्रों पर है। यह छात्रों को:

  • Recorded Classes
  • Live Interactive Sessions
  • AI-powered Education OTT Platform

के जरिए शिक्षा प्रदान करती है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ-साथ कंपनी ने ऑफलाइन पार्टनर सेंटर्स का नेटवर्क भी खड़ा किया है। यह Franchise-led, Asset-light Model पर काम करती है, जिससे कंपनी को तेजी से विस्तार करने में मदद मिलती है, जबकि कैपेक्स (Capital Expenditure) सीमित रहता है।


📊 मजबूत वित्तीय प्रदर्शन

IPO फाइलिंग ऐसे समय में आई है जब कंपनी ने अपने वित्तीय प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार दिखाया है।

FY25 में शानदार ग्रोथ

  • ऑपरेटिंग रेवेन्यू 120% बढ़कर ₹10.1 करोड़
  • FY24 में यह ₹4.6 करोड़ था

मुनाफे में बड़ी छलांग

  • FY25 में नेट प्रॉफिट ₹2.9 करोड़
  • FY24 में यह सिर्फ ₹34.4 लाख था

यानी कंपनी का मुनाफा लगभग 8 गुना बढ़ा है।

FY26 (सितंबर तक के 6 महीने)

  • ऑपरेटिंग रेवेन्यू: ₹12.4 करोड़
  • नेट प्रॉफिट: लगभग ₹4 करोड़

यह संकेत देता है कि कंपनी की ग्रोथ केवल एक साल की नहीं, बल्कि निरंतर बनी हुई है।


📉 Edtech सेक्टर में रिकवरी का संकेत?

पिछले दो वर्षों में edtech सेक्टर को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई कंपनियों ने लागत कम की, कर्मचारियों की छंटनी की और ग्रोथ से ज्यादा प्रॉफिटेबिलिटी पर ध्यान केंद्रित किया।

ऐसे माहौल में Klassroom का IPO प्लान यह दिखाता है कि छोटे लेकिन मजबूत बिजनेस मॉडल वाली कंपनियां अब पब्लिक मार्केट की ओर बढ़ने का आत्मविश्वास रखती हैं।

जहां कई बड़े edtech स्टार्टअप अभी भी घाटे से जूझ रहे हैं, वहीं Klassroom ने सीमित संसाधनों में भी ग्रोथ और मुनाफे का संतुलन बनाया है।


🤖 AI और टेक्नोलॉजी पर फोकस

Fresh issue से मिलने वाली पूंजी का बड़ा हिस्सा कंपनी अपनी AI और ML capabilities को बेहतर बनाने में लगाएगी।

आज के प्रतिस्पर्धी edtech माहौल में:

  • Personalized Learning
  • Data-driven Performance Tracking
  • Adaptive Content Delivery

जैसी टेक्नोलॉजी बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी हैं।

Klassroom का AI-powered OTT प्लेटफॉर्म इसी दिशा में एक कदम है, जो छात्रों को कस्टमाइज्ड लर्निंग अनुभव देने का दावा करता है।


🚀 आगे की रणनीति

IPO के बाद कंपनी की प्राथमिकताएं होंगी:

  • टेक्नोलॉजी में निवेश
  • कंटेंट लाइब्रेरी का विस्तार
  • नए शहरों में ऑफलाइन नेटवर्क बढ़ाना
  • मार्केटिंग के जरिए ब्रांड पहचान मजबूत करना

SME प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग से कंपनी को आगे चलकर मेन बोर्ड पर माइग्रेट करने का रास्ता भी मिल सकता है, यदि प्रदर्शन मजबूत रहता है।


🔎 निवेशकों के लिए क्या मायने?

Klassroom का IPO उन निवेशकों के लिए दिलचस्प हो सकता है जो:

  • SME सेक्टर में अवसर तलाश रहे हैं
  • प्रॉफिटेबल edtech कंपनियों में निवेश करना चाहते हैं
  • AI-आधारित शिक्षा मॉडल पर भरोसा रखते हैं

हालांकि, SME IPO में निवेश करते समय लिक्विडिटी और रिस्क फैक्टर को ध्यान में रखना जरूरी होता है।


📌 निष्कर्ष

Klassroom का DRHP दाखिल करना भारतीय edtech सेक्टर के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। कंपनी ने सीमित पैमाने पर लेकिन स्थिर और प्रॉफिटेबल ग्रोथ दिखाई है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि IPO को निवेशकों से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है और पब्लिक मार्केट में लिस्टिंग के बाद कंपनी अपने ग्रोथ ट्रैक को किस तरह आगे बढ़ाती है।

Edtech में एक नई पब्लिक कंपनी की एंट्री से सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता दोनों बढ़ने की उम्मीद है।

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Progcap

भारत के fintech सेक्टर से एक बड़ी खबर सामने आई है। Progcap ने वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने रेवेन्यू को लगभग दोगुना कर लिया है। इतना ही नहीं, कंपनी ने इसी अवधि में अपने घाटे को 87% तक कम करने में भी सफलता हासिल की है।

RoC (Registrar of Companies) से प्राप्त वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार, Progcap का ऑपरेशनल रेवेन्यू FY25 में 93% की बढ़त के साथ 139 करोड़ रुपये से बढ़कर 268 करोड़ रुपये हो गया। यह ग्रोथ ऐसे समय में आई है जब fintech सेक्टर फंडिंग और रेगुलेटरी दबावों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।


💼 क्या करती है Progcap?

Gurugram स्थित Progcap एक fintech प्लेटफॉर्म है, जो छोटे और मझोले व्यापारियों (MSMEs) को debt capital उपलब्ध कराता है। कंपनी विशेष रूप से उन micro और small retailers पर फोकस करती है, जिन्हें पारंपरिक बैंकों से लोन लेना मुश्किल होता है।

Progcap सप्लाई चेन को डिजिटाइज करके last-mile retailers को finance तक आसान पहुंच उपलब्ध कराती है। कंपनी की आय का प्रमुख स्रोत यही सर्विस रही है।

FY25 में कंपनी को डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज और current investments से लगभग 10 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय हुई, जिससे कुल आय बढ़कर 278 करोड़ रुपये हो गई, जो FY24 में 159 करोड़ रुपये थी।


📊 खर्चों में क्या रहा ट्रेंड?

जहां रेवेन्यू तेजी से बढ़ा, वहीं खर्चों में भी इजाफा हुआ, लेकिन नियंत्रित स्तर पर।

  • कर्मचारी लाभ (Employee benefit expenses) कुल खर्च का 45% रहा। यह खर्च FY25 में 126 करोड़ रुपये रहा, जो FY24 के 124 करोड़ रुपये के लगभग बराबर है।
  • फाइनेंस कॉस्ट में बड़ी छलांग देखने को मिली। यह 22.5 करोड़ रुपये से बढ़कर 91 करोड़ रुपये हो गया — यानी चार गुना से ज्यादा वृद्धि।
  • Write-offs 15 करोड़ रुपये से बढ़कर 24.5 करोड़ रुपये हो गए।
  • लीगल चार्जेज 6.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गए।

कुल मिलाकर, कंपनी का कुल खर्च 37% बढ़कर 203 करोड़ रुपये से 279 करोड़ रुपये हो गया।


📉 घाटे में भारी कमी, EBITDA पॉजिटिव

रेवेन्यू की तेज ग्रोथ के कारण Progcap ने घाटे को 46 करोड़ रुपये से घटाकर मात्र 6 करोड़ रुपये तक ला दिया। यानी 87% की कमी।

कंपनी ने FY25 में 75 करोड़ रुपये का पॉजिटिव EBITDA दर्ज किया, जिसमें EBITDA मार्जिन 27.99% रहा।

ROCE (Return on Capital Employed) 7.40% रहा, जो यह दिखाता है कि कंपनी अब पूंजी का बेहतर उपयोग कर रही है।

यूनिट इकॉनॉमिक्स भी बेहतर हुए हैं। FY25 में कंपनी ने 1 रुपये कमाने के लिए 1.04 रुपये खर्च किए, जबकि FY24 में यह आंकड़ा 1.46 रुपये था।

मार्च 2025 के अंत तक कंपनी के पास 207 करोड़ रुपये का कैश और बैंक बैलेंस था। वहीं, करंट एसेट्स बढ़कर 1,799 करोड़ रुपये तक पहुंच गए।


💰 निवेश और शेयरहोल्डिंग

Progcap ने अब तक लगभग 111 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है। इसके प्रमुख निवेशकों में Tiger Global, Peak XV Partners, Creation Investments और GrowX Ventures शामिल हैं।

कंपनी की सह-संस्थापक Pallavi Shrivastava और Himanshu Chandra के पास संयुक्त रूप से 23.41% हिस्सेदारी है, जो संस्थापकों की मजबूत पकड़ को दर्शाता है।


🆚 प्रतियोगिता: FlexiLoans से तुलना

Progcap के प्रतिस्पर्धी FlexiLoans ने भी FY25 में अच्छा प्रदर्शन किया। FlexiLoans का रेवेन्यू 47% बढ़कर 385 करोड़ रुपये हो गया, जबकि मुनाफा 3 करोड़ रुपये से बढ़कर 4 करोड़ रुपये पहुंच गया।

हालांकि FlexiLoans मुनाफे में है, लेकिन Progcap की रेवेन्यू ग्रोथ और घाटे में तेज कमी इसे निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाती है।


🔄 बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव

Progcap ने 2022 तक एक capital-light marketplace मॉडल अपनाया था, जिसमें वह केवल बड़े लेंडर्स और रिटेलर्स के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाती थी। उस समय लोन का जोखिम बड़े फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस उठाते थे।

लेकिन अब कंपनी ने अपना खुद का NBFC (Non-Banking Financial Company) मॉडल अपनाया है, जिसके जरिए वह खुद भी लेंडिंग करती है।

इस बदलाव के कारण कंपनी की फंडिंग जरूरतें बढ़ी हैं, लेकिन इससे उसे ज्यादा कंट्रोल और बेहतर मार्जिन भी मिला है।

कंपनी ने “credit on tap” जैसे इनोवेटिव प्रोडक्ट लॉन्च किए हैं, जो छोटे शहरों और कस्बों के रिटेलर्स के लिए खास तौर पर डिजाइन किए गए हैं। यही इसकी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त (moat) बनती जा रही है।


📈 IPO की तैयारी?

बाजार में चर्चा है कि Progcap भविष्य में IPO की तैयारी कर सकती है। FY25 के मजबूत आंकड़े और FY26 में संभावित मुनाफे की उम्मीद इसे एक मजबूत IPO उम्मीदवार बना सकते हैं।

टियर-2 और टियर-3 शहरों के रिटेलर्स पर फोकस और टेक्नोलॉजी आधारित लेंडिंग मॉडल के चलते Progcap आने वाले वर्षों में fintech सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में शामिल हो सकती है।


🔍 निष्कर्ष

Progcap ने FY25 में यह साबित कर दिया है कि सही रणनीति और disciplined execution के साथ fintech कंपनियां न सिर्फ तेजी से बढ़ सकती हैं, बल्कि घाटे को भी नियंत्रित कर सकती हैं।

लगभग दोगुना रेवेन्यू, 87% घटा घाटा और पॉजिटिव EBITDA — ये संकेत देते हैं कि कंपनी सही दिशा में आगे बढ़ रही है।

अब नजर FY26 पर होगी — क्या Progcap पूरी तरह मुनाफे में आएगी और IPO की राह पकड़ेगी?

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Read more :🍔 Swiggy ने बंद किया 10–15 मिनट फूड डिलीवरी ऐप Snacc,

🍔 Swiggy ने बंद किया 10–15 मिनट फूड डिलीवरी ऐप Snacc,

Swiggy

भारत के फूड डिलीवरी सेक्टर से एक अहम अपडेट सामने आई है। Bengaluru स्थित फूड डिलीवरी दिग्गज Swiggy ने अपने 10–15 मिनट फूड डिलीवरी ऐप Snacc को लॉन्च के एक साल से भी कम समय में बंद करने का फैसला किया है।

यह जानकारी कर्मचारियों को भेजे गए एक आंतरिक ईमेल के जरिए सामने आई, जिसकी समीक्षा मीडिया प्लेटफॉर्म Entrackr ने की है।


🚀 क्या था Snacc?

Snacc को जनवरी 2025 में एक standalone ऐप के रूप में लॉन्च किया गया था। इसका उद्देश्य 10–15 मिनट में snacks, beverages और ready-to-eat फूड आइटम्स की डिलीवरी करना था।

यह Swiggy के मुख्य ऐप से अलग एक प्रयोग था, जहां ultra-fast food delivery मॉडल को टेस्ट किया जा रहा था।

Snacc का संचालन centrally stocked hubs के जरिए किया जाता था। यानी सामान पहले से स्टॉक में रखा जाता और ऑर्डर मिलते ही तुरंत डिलीवरी के लिए भेज दिया जाता था।

यह मॉडल quick commerce की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया था।


📈 मुख्य बिज़नेस में मजबूत ग्रोथ

हालांकि Snacc को बंद किया जा रहा है, लेकिन Swiggy के मुख्य फूड डिलीवरी बिज़नेस की ग्रोथ मजबूत बनी हुई है।

कंपनी के आंतरिक ईमेल के अनुसार, Swiggy के फूड डिलीवरी सेगमेंट ने सालाना आधार पर 20.5% की ग्रोथ दर्ज की है।

यह वृद्धि ऑर्डर वॉल्यूम में बढ़ोतरी और बेहतर Average Order Value (AOV) के कारण हुई है।

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह disciplined capital allocation यानी पूंजी के समझदारी भरे उपयोग और scalable initiatives को प्राथमिकता दे रही है।


🌆 सीमित बाजारों तक ही रहा Snacc

Snacc को शुरुआत में Bengaluru के कुछ हिस्सों में रोलआउट किया गया था। बाद में इसे Gurugram और Noida तक विस्तार दिया गया।

हालांकि, यह सेवा कुछ ही बाजारों तक सीमित रही और देशभर में इसका व्यापक विस्तार नहीं हो सका।

कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर स्केल न कर पाना इस प्रोजेक्ट के बंद होने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।


🛑 Ultra-fast फूड डिलीवरी मॉडल की चुनौतियां

पिछले कुछ वर्षों में quick commerce और 10 मिनट डिलीवरी मॉडल ने काफी लोकप्रियता हासिल की है।

लेकिन ultra-fast फूड डिलीवरी मॉडल में कई ऑपरेशनल चुनौतियां भी हैं—

  • उच्च लॉजिस्टिक्स लागत
  • सीमित मार्जिन
  • डिमांड का अनिश्चित पैटर्न
  • इन्वेंट्री मैनेजमेंट की जटिलता

Snacc का बंद होना यह संकेत देता है कि हर quick commerce प्रयोग लंबी अवधि में सफल नहीं होता।


🏬 सेक्टर में अन्य उदाहरण

यह पहली बार नहीं है जब किसी कंपनी ने ultra-fast फूड मॉडल में पीछे कदम लिया हो।

पिछले साल Zepto की quick-service फूड वर्टिकल Zepto Café ने लगभग 600 में से 200 स्टोर्स बंद कर दिए थे। यह फैसला कमजोर डिमांड और आंतरिक पुनर्गठन के तहत लिया गया था।

वहीं, Ola ने अपने Ola Foods को दोबारा लॉन्च करने के बाद भी फिलहाल होल्ड पर रख दिया है।

इन उदाहरणों से साफ है कि फूड डिलीवरी और quick service मॉडल में प्रतिस्पर्धा तेज है और मार्जिन पर दबाव बना हुआ है।


🔍 Swiggy की रणनीति क्या संकेत देती है?

Snacc को बंद करना Swiggy की रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

कंपनी अब उन प्रोजेक्ट्स पर फोकस करना चाहती है जो बड़े पैमाने पर स्केल हो सकें और लंबे समय तक टिकाऊ (sustainable) साबित हों।

Swiggy का मुख्य फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पहले से मजबूत है और 20.5% की सालाना वृद्धि यह दिखाती है कि कोर बिज़नेस में मांग बनी हुई है।

इसलिए कंपनी ने संभवतः तय किया कि संसाधनों को एक सीमित और जोखिम भरे प्रयोग के बजाय मुख्य बिज़नेस में लगाया जाए।


📊 बड़ा संकेत क्या है?

Snacc का बंद होना भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।

2021–2022 के हाइपर-ग्रोथ दौर में कंपनियां तेजी से नए प्रयोग कर रही थीं। लेकिन अब निवेशकों और कंपनियों का फोकस profitability, capital efficiency और sustainable growth पर है।

Ultra-fast delivery मॉडल आकर्षक जरूर है, लेकिन हर कैटेगरी में यह आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो, यह जरूरी नहीं।


📌 निष्कर्ष

Swiggy द्वारा Snacc को लॉन्च के एक साल के भीतर बंद करना यह दर्शाता है कि कंपनी अब अधिक disciplined growth रणनीति अपना रही है।

हालांकि मुख्य फूड डिलीवरी बिज़नेस मजबूत ग्रोथ दिखा रहा है, लेकिन ultra-fast standalone मॉडल उतना सफल नहीं हो सका।

यह फैसला बताता है कि भारतीय फूड डिलीवरी सेक्टर अब परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है, जहां प्राथमिकता सिर्फ तेज विस्तार नहीं बल्कि स्थायी और लाभदायक वृद्धि है।

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Read more :💰 CoinDCX का ₹111 करोड़ का ESOP बायबैक,

💰 CoinDCX का ₹111 करोड़ का ESOP बायबैक,

CoinDCX

भारत के क्रिप्टो सेक्टर से बड़ी खबर सामने आई है। देश के प्रमुख क्रिप्टो एक्सचेंज CoinDCX ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा ESOP (Employee Stock Ownership Plan) लिक्विडिटी इवेंट घोषित किया है। कंपनी ₹111 करोड़ के रणनीतिक बायबैक के जरिए 500 से अधिक मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों को वेल्थ क्रिएशन का अवसर दे रही है।

यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारतीय क्रिप्टो इंडस्ट्री नियामकीय (regulatory) अनिश्चितताओं और टैक्सेशन से जुड़े दबावों का सामना कर रही है। इसके बावजूद CoinDCX ने कर्मचारियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए यह बड़ा फैसला लिया है।


📈 Coinbase निवेश के बाद बड़ा कदम

यह घोषणा चार महीने बाद आई है जब CoinDCX को अमेरिकी क्रिप्टो दिग्गज Coinbase से एक अघोषित निवेश प्राप्त हुआ था। उस समय कंपनी की पोस्ट-मनी वैल्यूएशन $2.45 बिलियन बताई गई थी।

इससे पहले अप्रैल 2022 में CoinDCX ने $135 मिलियन की फंडिंग जुटाई थी, जिससे कंपनी की वैल्यूएशन $2 बिलियन से अधिक हो गई थी।

इन निवेशों ने CoinDCX को भारत के सबसे मूल्यवान क्रिप्टो स्टार्टअप्स में शामिल कर दिया है।


🗣️ क्या बोले को-फाउंडर?

CoinDCX के को-फाउंडर Sumit Gupta ने बायबैक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय क्रिप्टो इंडस्ट्री ने बेहद चुनौतीपूर्ण दौर का सामना किया है, खासकर तब जब रेगुलेटरी फ्रेमवर्क अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

उन्होंने कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद CoinDCX पहले से अधिक मजबूत और स्थिर बनकर उभरा है। यह भारत और UAE में 2 करोड़ से अधिक ग्राहकों के भरोसे और निवेशकों के निरंतर समर्थन का परिणाम है।


🌍 2 करोड़ यूजर्स और 500+ क्रिप्टो एसेट्स

2018 में स्थापित CoinDCX आज भारत में 20 मिलियन से अधिक यूजर्स को क्रिप्टो ट्रेडिंग और निवेश सेवाएं प्रदान करता है।

प्लेटफॉर्म पर 500 से अधिक क्रिप्टो एसेट्स और 200 से ज्यादा ट्रेडिंग पेयर्स उपलब्ध हैं। कंपनी खुदरा (retail) और संस्थागत (institutional) दोनों निवेशकों के लिए अलग-अलग प्रोडक्ट्स ऑफर करती है।

2024 में कंपनी ने Middle East और North Africa (MENA) क्षेत्र में प्रवेश किया था, जब उसने BitOasis का अधिग्रहण किया।


🏢 DCX Group के तहत कई प्लेटफॉर्म

CoinDCX, DCX Group के अंतर्गत काम करता है। इस ग्रुप में CoinDCX Ventures और Okto भी शामिल हैं।

Okto एक Web3 वॉलेट प्लेटफॉर्म है, जिसके 20 मिलियन से अधिक यूजर्स हैं।

इस तरह कंपनी न केवल ट्रेडिंग बल्कि Web3 इकोसिस्टम में भी अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही है।


📊 2026 में ESOP बायबैक की लहर

CoinDCX का यह कदम 2026 में चौथा बड़ा ESOP बायबैक है।

हाल ही में Cashfree ने 400 से अधिक कर्मचारियों के लिए ESOP बायबैक की घोषणा की थी। हेल्थटेक कंपनी Innovaccer ने करीब $75 मिलियन का बायबैक पूरा किया, जबकि SaaS यूनिकॉर्न BrowserStack ने $125 मिलियन का ESOP लिक्विडिटी प्रोग्राम लॉन्च किया।

यह ट्रेंड दिखाता है कि स्टार्टअप्स अब कर्मचारियों को रिवॉर्ड देने के लिए लिक्विडिटी इवेंट्स का सहारा ले रहे हैं।


📉 ESOP ट्रेंड में गिरावट

हालांकि ESOP बायबैक की गतिविधियां 2026 में बढ़ती दिख रही हैं, लेकिन 2025 में यह ट्रेंड काफी कमजोर रहा।

2025 में कुल ESOP बायबैक और लिक्विडिटी इवेंट्स का आंकड़ा $75 मिलियन के आसपास था।

इसके मुकाबले 2024 में यह आंकड़ा करीब $190 मिलियन था। वहीं 2023 में $802 मिलियन, 2021 में $440 मिलियन और 2022 में $200 मिलियन रहा था।

यह डेटा बताता है कि स्टार्टअप फंडिंग स्लोडाउन का असर ESOP लिक्विडिटी पर भी पड़ा है।


🔎 बड़ा संकेत क्या है?

CoinDCX का ₹111 करोड़ का ESOP बायबैक कई संकेत देता है।

पहला, कंपनी अपनी मजबूत कैश पोजिशन और निवेशकों के भरोसे के चलते कर्मचारियों को रिवॉर्ड देने की स्थिति में है।

दूसरा, यह कदम कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने और टैलेंट को बनाए रखने में मदद करेगा, खासकर ऐसे समय में जब क्रिप्टो सेक्टर में अनिश्चितता बनी हुई है।

तीसरा, यह इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम में ESOP को एक महत्वपूर्ण वेल्थ क्रिएशन टूल के रूप में स्थापित करता है।


📌 निष्कर्ष

CoinDCX का ₹111 करोड़ का ESOP बायबैक न केवल कंपनी के इतिहास का सबसे बड़ा लिक्विडिटी इवेंट है, बल्कि भारतीय क्रिप्टो इंडस्ट्री के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।

चुनौतीपूर्ण रेगुलेटरी माहौल के बावजूद कंपनी ने अपने कर्मचारियों को वेल्थ क्रिएशन का अवसर देकर यह दिखाया है कि वह दीर्घकालिक विकास और भरोसे पर काम कर रही है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या क्रिप्टो सेक्टर में स्थिरता बढ़ती है और ESOP बायबैक का ट्रेंड फिर से तेजी पकड़ता है।

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Read more :💎 Giva जुटाएगी ₹110 करोड़,

💎 Giva जुटाएगी ₹110 करोड़,

Giva

भारत के तेजी से बढ़ते omnichannel jewellery बाजार से बड़ी खबर सामने आई है। Bengaluru स्थित ज्वेलरी स्टार्टअप Giva अपनी Series C extension राउंड में ₹110 करोड़ (करीब $12 मिलियन) जुटाने जा रही है। इस राउंड को HPV CC1 Ltd लीड करेगा, जबकि Premji Invest, Kenro Capital और Titan Capital भी इसमें हिस्सा लेंगे।

यह निवेश ऐसे समय में आ रहा है जब कंपनी ने करीब नौ महीने पहले ही ₹530 करोड़ ($61.5 मिलियन) की Series C फंडिंग जुटाई थी, जिसे Creaegis ने लीड किया था।


📑 बोर्ड ने पास किया प्रस्ताव

RoC (Registrar of Companies) में दाखिल दस्तावेजों के अनुसार, Giva के बोर्ड ने 94,01,710 Series C1 CCPS शेयर ₹117 प्रति शेयर की कीमत पर जारी करने की मंजूरी दी है। इस इश्यू के जरिए कंपनी ₹110 करोड़ जुटाएगी।

HPV CC1 Ltd इस राउंड में ₹74.25 करोड़ ($8.25 मिलियन) का निवेश करेगा। Kenro Capital ₹13.75 करोड़ लगाएगा, जबकि Premji Invest और Titan Capital ₹11-11 करोड़ का निवेश करेंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस राउंड में Kenro Capital द्वारा सेकेंडरी ट्रांजैक्शन भी शामिल हो सकता है।


📈 वैल्यूएशन में 22% की बढ़ोतरी

अनुमान है कि इस नए निवेश के बाद Giva की वैल्यूएशन करीब ₹4,900 करोड़ ($545 मिलियन) तक पहुंच सकती है। यह कंपनी की पिछली वैल्यूएशन ₹4,000 करोड़ से करीब 22% अधिक है।

यह उछाल बताता है कि निवेशक अभी भी नए जमाने के ज्वेलरी ब्रांड्स में मजबूत भरोसा दिखा रहे हैं।


🛍️ फंड का इस्तेमाल कहां होगा?

कंपनी इस ताजा फंड का उपयोग ऑपरेशनल खर्चों, हायरिंग, मार्केटिंग और अन्य कॉरपोरेट जरूरतों के लिए करेगी।

Giva पिछले कुछ वर्षों में तेजी से अपने फिजिकल स्टोर नेटवर्क का विस्तार कर रही है। कंपनी अब भारत में लगभग 150 ऑफलाइन स्टोर्स संचालित करती है, साथ ही अपनी वेबसाइट और मोबाइल ऐप के जरिए ऑनलाइन बिक्री भी करती है।

Giva ने फ्रेंचाइज़ी मॉडल अपनाकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी अपनी पहुंच मजबूत की है।


💍 2019 से अब तक का सफर

2019 में स्थापित Giva ने शुरुआत एक affordable jewellery ब्रांड के रूप में की थी। बाद में कंपनी ने गोल्ड ज्वेलरी और lab-grown diamonds सेगमेंट में भी एंट्री की।

कंपनी का नेतृत्व Ishendra Agarwal कर रहे हैं। अब तक Giva कुल मिलाकर $146 मिलियन से अधिक की फंडिंग जुटा चुकी है, जिसमें ₹255 करोड़ की Series B राउंड भी शामिल है।


📊 FY25 में जबरदस्त ग्रोथ, लेकिन घाटा भी बढ़ा

वित्त वर्ष 2025 में Giva की ऑपरेटिंग रेवेन्यू 89% बढ़कर ₹518 करोड़ हो गई, जो FY24 में ₹274 करोड़ थी।

हालांकि, तेज ग्रोथ के साथ घाटा भी बढ़ा। FY25 में कंपनी का नुकसान 22% बढ़कर ₹72 करोड़ तक पहुंच गया।

यह दर्शाता है कि तेजी से विस्तार और मार्केटिंग खर्चों के कारण मार्जिन पर दबाव बना हुआ है।


🏬 प्रतिस्पर्धा भी तेज

नए जमाने के ज्वेलरी सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है।

प्रतिद्वंद्वी BlueStone अगस्त 2025 में पब्लिक हो चुकी है। FY25 में BlueStone का रेवेन्यू 40% बढ़कर ₹1,770 करोड़ हो गया, जबकि घाटा 56% बढ़कर ₹222 करोड़ पहुंच गया। कंपनी 200 से अधिक स्टोर्स संचालित करती है।

वहीं, CaratLane, जो Titan Company Limited की सहायक कंपनी है, ने FY25 में ₹3,583 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया और उसके 350 से अधिक स्टोर्स हैं।

इसके अलावा Palmonas और Firefly Diamonds जैसे नए खिलाड़ी भी मार्केट में तेजी से उभर रहे हैं।


🔎 बड़ा संकेत क्या है?

भारत का ज्वेलरी बाजार तेजी से omnichannel मॉडल की ओर बढ़ रहा है। ग्राहक अब ऑनलाइन ब्राउजिंग और ऑफलाइन ट्रायल दोनों चाहते हैं।

Giva का फ्रेंचाइज़ी-ड्रिवन विस्तार और डिजिटल फोकस इस बदलते उपभोक्ता व्यवहार के अनुरूप है।

हालांकि, तेजी से स्केल करने के साथ-साथ प्रॉफिटेबिलिटी को संतुलित रखना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।


📌 निष्कर्ष

Giva का ₹110 करोड़ का Series C extension राउंड यह दिखाता है कि निवेशक अभी भी नए जमाने के ज्वेलरी ब्रांड्स पर दांव लगा रहे हैं।

वैल्यूएशन में 22% की बढ़ोतरी और लगातार रेवेन्यू ग्रोथ कंपनी के मजबूत विस्तार की ओर इशारा करती है।

लेकिन बढ़ते घाटे को कम करना और मार्जिन सुधारना आने वाले समय में कंपनी की प्राथमिकता होगी।

भारतीय ज्वेलरी बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज है, और अब खेल सिर्फ ग्रोथ का नहीं, बल्कि सस्टेनेबल ग्रोथ का है।

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Read more :🚀 Zypp Electric ने FY25 में पार किया ₹400 करोड़ का आंकड़ा,

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Zypp Electric

भारत के EV और shared mobility सेक्टर से बड़ी खबर सामने आई है। B2B delivery और shared mobility प्लेटफॉर्म Zypp Electric ने वित्त वर्ष 2025 (FY25) में मजबूत ग्रोथ दर्ज की है। कंपनी ने सालाना आधार पर 50% की वृद्धि हासिल करते हुए ₹400 करोड़ से अधिक का रेवेन्यू पार कर लिया है।

Registrar of Companies (RoC) से प्राप्त वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार, Zypp Electric का ऑपरेशनल रेवेन्यू FY25 में बढ़कर ₹438 करोड़ हो गया, जो FY24 में ₹293 करोड़ था। यह ग्रोथ उस समय आई है जब EV सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।


📦 डिलीवरी बिज़नेस बना ग्रोथ का इंजन

Zypp Electric एक EV-as-a-service प्लेटफॉर्म है, जो गिग वर्कर्स को इलेक्ट्रिक स्कूटर रेंट पर देने के साथ-साथ डिलीवरी सेवाएं भी प्रदान करता है।

कंपनी के कुल ऑपरेशनल रेवेन्यू में 74% हिस्सा डिलीवरी सेवाओं से आया। FY25 में डिलीवरी से आय 56% बढ़कर ₹323 करोड़ हो गई, जो पिछले वित्त वर्ष में ₹207 करोड़ के आसपास थी।

वहीं, वाहन रेंटल से होने वाली आय 32% की वृद्धि के साथ ₹111 करोड़ तक पहुंच गई, जो FY24 में ₹84 करोड़ थी।

इसके अलावा कंपनी ने ब्याज आय से ₹11 करोड़ अर्जित किए, जिससे FY25 में कुल आय ₹449 करोड़ हो गई।


💸 खर्चों में तेज़ बढ़ोतरी

जहां एक ओर कंपनी ने टॉपलाइन ग्रोथ दिखाई, वहीं खर्चों में भी भारी इजाफा हुआ।

कंपनी के कुल खर्चों का 64% हिस्सा प्रोडक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और अन्य ऑपरेशनल गतिविधियों (मुख्यतः राइडर्स के खर्च) पर गया। यह खर्च FY25 में 49% बढ़कर ₹355 करोड़ हो गया, जो FY24 में ₹238 करोड़ था।

कर्मचारी लाभ (Employee Benefit Expenses) में भी 43% की वृद्धि हुई और यह ₹67 करोड़ तक पहुंच गया। इसके अलावा, डिप्रिसिएशन (Depreciation) चार्ज ₹38.5 करोड़ रहा।

किराया, लीगल और अन्य ओवरहेड खर्चों को मिलाकर कंपनी का कुल व्यय FY25 में 42% बढ़कर ₹556 करोड़ हो गया, जो FY24 में ₹392 करोड़ था।


📉 घाटा बढ़ा, मार्जिन नेगेटिव

तेज़ रेवेन्यू ग्रोथ के बावजूद बढ़ती लागत के कारण कंपनी का घाटा भी बढ़ा है।

FY25 में Zypp Electric को ₹107.5 करोड़ का नुकसान हुआ, जो FY24 में ₹89.5 करोड़ था।

कंपनी का EBITDA मार्जिन -15.98% रहा, जबकि ROCE -52.16% पर रहा।

यूनिट इकॉनॉमिक्स की बात करें तो FY25 में कंपनी ने ₹1 कमाने के लिए ₹1.27 खर्च किए। यह संकेत देता है कि अभी भी बिज़नेस मॉडल को प्रॉफिटेबिलिटी की दिशा में और सुधार की जरूरत है।


💰 कैश पोज़िशन और फंडिंग अपडेट

FY25 के अंत तक कंपनी के पास ₹72.5 करोड़ का कैश और बैंक बैलेंस था। वहीं, इसके करंट एसेट्स ₹174.5 करोड़ रहे।

अब तक Zypp Electric लगभग $76.5 मिलियन की फंडिंग जुटा चुकी है, जिसमें जापान की ऊर्जा कंपनी ENEOS Group प्रमुख निवेशक है।

हाल ही में, गुरुग्राम स्थित यह कंपनी अपने जारी Series C राउंड के तहत ₹55.4 करोड़ (लगभग $6.5 मिलियन) 16 निवेशकों से जुटा रही है। यह फंडिंग कंपनी को अपने बेड़े (fleet) के विस्तार और टेक्नोलॉजी अपग्रेड में मदद करेगी।


🏍️ प्रतिस्पर्धा में Yulu की एंट्री

EV mobility स्पेस में Zypp Electric को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

प्रतिद्वंद्वी Yulu ने FY25 में 98% की सालाना वृद्धि के साथ ₹237.4 करोड़ का ऑपरेटिंग रेवेन्यू दर्ज किया।

हालांकि Yulu का घाटा 12% घटकर ₹126 करोड़ रह गया, जो FY24 में ₹142.8 करोड़ था।

इस तुलना से स्पष्ट है कि सेक्टर में कंपनियां तेज़ी से स्केल कर रही हैं, लेकिन प्रॉफिटेबिलिटी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।


🔍 बड़ा संकेत क्या है?

Zypp Electric के FY25 नतीजे यह दर्शाते हैं कि B2B EV डिलीवरी और shared mobility मॉडल में मांग मजबूत बनी हुई है। खासकर ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स कंपनियों की बढ़ती जरूरतों ने EV डिलीवरी सेवाओं को गति दी है।

हालांकि, बढ़ती लागत और ऑपरेशनल खर्चों ने मार्जिन पर दबाव डाला है।

सेक्टर अब सिर्फ ग्रोथ नहीं, बल्कि सस्टेनेबल ग्रोथ की दिशा में आगे बढ़ रहा है। निवेशक भी अब यूनिट इकॉनॉमिक्स और मार्जिन सुधार पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।


📌 निष्कर्ष

Zypp Electric ने FY25 में ₹438 करोड़ का ऑपरेशनल रेवेन्यू हासिल कर 50% की मजबूत वृद्धि दर्ज की है। लेकिन खर्चों में तेज़ बढ़ोतरी के कारण घाटा भी बढ़ गया है।

EV डिलीवरी स्पेस में प्रतिस्पर्धा तेज़ है और कंपनियों के सामने स्केल के साथ-साथ प्रॉफिटेबिलिटी का संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या Zypp Electric अपने मजबूत ग्रोथ मोमेंटम को बनाए रखते हुए घाटे को कम कर पाती है या नहीं।

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Read more :🚀Vervesemi ने जुटाए $10 मिलियन,

🚀Vervesemi ने जुटाए $10 मिलियन,

Vervesemi

भारत का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तेजी से मजबूत हो रहा है और इसी कड़ी में नोएडा आधारित स्टार्टअप Vervesemi ने Series A राउंड में 10 मिलियन डॉलर (करीब 83 करोड़ रुपये) की फंडिंग जुटाई है। यह राउंड मशहूर निवेशक Ashish Kacholia और Unicorn India Ventures ने को-लीड किया है।

इस राउंड में Roots Ventures, Caperize Fina और MAIQ Growth Scheme ने भी भागीदारी की। इससे पहले कंपनी ने 5 लाख डॉलर (500,000 डॉलर) की शुरुआती फंडिंग जुटाई थी।


💡 फंडिंग का इस्तेमाल कहाँ होगा?

कंपनी के अनुसार, इस नई पूंजी का उपयोग अपने machine learning–enabled analog signal chain IC पोर्टफोलियो को तेजी से commercialize करने में किया जाएगा। साथ ही कंपनी:

  • अपने IP (Intellectual Property) पोर्टफोलियो का विस्तार करेगी
  • R&D क्षमताओं को मजबूत करेगी
  • एशिया, अमेरिका और अन्य प्रमुख सेमीकंडक्टर बाजारों में go-to-market उपस्थिति बनाएगी

यानी यह फंडिंग सिर्फ टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल स्केल पर बिजनेस विस्तार की रणनीति का हिस्सा है।


🏭 क्या करती है Vervesemi?

2017 में Rakesh Malik और Pratap Narayan Singh द्वारा स्थापित Vervesemi एक fabless semiconductor कंपनी है। Fabless मॉडल का मतलब है कि कंपनी चिप डिजाइन करती है लेकिन खुद मैन्युफैक्चरिंग प्लांट (fab) नहीं चलाती।

कंपनी हाई-परफॉर्मेंस analog और mixed-signal IP तथा differentiated integrated circuits विकसित करती है। इसके समाधान विशेष रूप से mission-critical environments के लिए बनाए गए हैं, जहां reliability और precision बेहद जरूरी होती है।

Vervesemi का दावा है कि वह proprietary machine learning आधारित आर्किटेक्चर का उपयोग करती है, जिससे:

  • Reliability बेहतर होती है
  • Yield (उत्पादन दक्षता) बढ़ती है
  • System-level performance में सुधार होता है

🔬 टेक्नोलॉजी में बड़ी प्रगति

पिछले एक साल में कंपनी ने तकनीकी परिपक्वता (technology maturation) और commercial readiness में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

कंपनी ने अपनी ML-enabled analog signal chain architecture को silicon में validate कर लिया है। इसका मतलब है कि डिजाइन सिर्फ लैब में नहीं, बल्कि असली चिप्स में सफलतापूर्वक काम कर रहा है।

कई ग्राहक अब production स्टेज में प्रवेश कर चुके हैं। इसके अलावा कंपनी ने industrial और smart energy सेगमेंट में अपने प्रोडक्ट पाइपलाइन और ग्राहक नेटवर्क का विस्तार किया है।


⚡ EV और ड्रोन सेक्टर में एंट्री

Vervesemi ने हाल ही में एक नया motor control product line लॉन्च किया है। यह खासतौर पर high-efficiency और high-reliability एप्लिकेशंस के लिए डिजाइन किया गया है, जिनमें शामिल हैं:

  • Electric Vehicles (EVs)
  • Drones
  • Industrial Automation सिस्टम

इन समाधानों में precision sensing, control intelligence और advanced fault detection जैसे फीचर्स शामिल हैं। इसका उद्देश्य performance और safety दोनों को बेहतर बनाना है।

भारत में EV और स्मार्ट इंडस्ट्री सेक्टर तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में यह प्रोडक्ट लाइन कंपनी के लिए बड़े अवसर खोल सकती है।


🤝 ग्लोबल पार्टनरशिप और इकोसिस्टम

Vervesemi ने fabrication, packaging और testing कंपनियों के साथ अपनी साझेदारी मजबूत की है ताकि scalable production और तेज silicon validation cycle सुनिश्चित की जा सके।

कंपनी Samsung Advanced Foundry Ecosystem (SAFE) के IP alliance partner के रूप में भी जुड़ी हुई है। इसके अलावा यह United Microelectronics Corporation (UMC) की IP alliance partner भी है।

ये साझेदारियां कंपनी को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीयता और बड़े ग्राहकों तक पहुंच दिलाने में मदद करती हैं।


📊 IP और पेटेंट पोर्टफोलियो

Vervesemi का दावा है कि उसने अब तक:

  • 140 से अधिक semiconductor IP blocks
  • 25 IC product variants

विकसित किए हैं।

ये समाधान space, defence, industrial, motor control और smart energy जैसे क्षेत्रों में उपयोग किए जा रहे हैं।

कंपनी का पोर्टफोलियो 10 patents और 5 trade secrets से समर्थित है, जो इसकी तकनीकी मजबूती को दर्शाता है।


🇮🇳 भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फंडिंग?

भारत लंबे समय से सेमीकंडक्टर डिजाइन में मजबूत रहा है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग और deep-tech IP डेवलपमेंट में अभी भी विकास की जरूरत है।

Vervesemi जैसी कंपनियां:

  • भारत को global chip design मैप पर मजबूत बना सकती हैं
  • Import dependence कम करने में मदद कर सकती हैं
  • High-value R&D जॉब्स पैदा कर सकती हैं

Machine learning और semiconductor डिजाइन का संयोजन इसे एक high-tech, future-ready कंपनी बनाता है।


📌 बड़ा संकेत: Deep-Tech में निवेशकों का भरोसा

यह फंडिंग इस बात का संकेत है कि निवेशक अब सिर्फ consumer startups में नहीं, बल्कि deep-tech और semiconductor जैसे जटिल क्षेत्रों में भी निवेश करने को तैयार हैं।

Ashish Kacholia और Unicorn India Ventures जैसे निवेशकों का जुड़ना Vervesemi के बिजनेस मॉडल और टेक्नोलॉजी पर भरोसे को दर्शाता है।


🔮 आगे क्या?

आने वाले समय में कंपनी का फोकस होगा:

  • ग्लोबल मार्केट में विस्तार
  • नए NPI (New Product Introduction)
  • EV और स्मार्ट एनर्जी सेगमेंट में मजबूत पकड़
  • IP पोर्टफोलियो का और विस्तार

अगर कंपनी अपनी commercialization रणनीति को सफलतापूर्वक लागू करती है, तो यह भारतीय सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है।

Vervesemi की यह फंडिंग सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता नहीं, बल्कि भारत के deep-tech भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 🚀

Read more :💊 AI-आधारित ड्रग डिस्कवरी स्टार्टअप Peptris ने जुटाए ₹70 करोड़,

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Peptris

भारत के हेल्थटेक और बायोटेक सेक्टर से एक अहम फंडिंग अपडेट सामने आया है। ड्रग डिस्कवरी पर काम करने वाली बेंगलुरु आधारित कंपनी Peptris ने Series A फंडिंग राउंड में ₹70 करोड़ (करीब $7.7 मिलियन) जुटाए हैं। इस राउंड का नेतृत्व IAN Alpha Fund और Speciale Invest ने संयुक्त रूप से किया। इसके अलावा Tenacity Ventures, BYT Ventures और अन्य निवेशकों ने भी भागीदारी की।

यह निवेश ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में दवाओं की खोज की प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।


🚀 फंड का उपयोग कहां होगा?

Peptris के अनुसार, इस ताजा पूंजी का उपयोग अगले 24 महीनों में कंपनी के मौजूदा प्रोग्राम्स को क्लिनिकल रेडीनेस की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए किया जाएगा। साथ ही, कंपनी अपनी पाइपलाइन का विस्तार करेगी और बायोलॉजी, केमिस्ट्री, डेटा साइंस और AI टीमों को मजबूत करेगी।

ड्रग डेवलपमेंट एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है। ऐसे में AI आधारित मॉडल्स का उपयोग करके समय और लागत दोनों कम करना कंपनी का मुख्य लक्ष्य है।


🧠 2019 में हुई थी शुरुआत

Peptris की स्थापना 2019 में नारायणन वेंकटसुब्रमणियन, श्रीधर नारायणन, आनंद बुडनी और अमित महाजन ने की थी। कंपनी ने ऐसे AI मॉडल विकसित किए हैं जो नई और अनोखी अणुओं (molecules) को डिजाइन करने के साथ-साथ ड्रग डेवलपमेंट से जुड़े महत्वपूर्ण पैरामीटर्स की भविष्यवाणी भी कर सकते हैं।

इस तकनीक की मदद से कंपनी Novel Chemical Entities (NCEs) की खोज करने में सफल रही है। इसके अलावा, Peptris दवाओं के पुनः उपयोग (drug repurposing) और पहले से रुके हुए प्रोग्राम्स को दोबारा शुरू करने (drug rescue) के अवसर भी तलाशती है।


⚠ ड्रग डिस्कवरी की बड़ी चुनौती

वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद, ड्रग डिस्कवरी आज भी धीमी, महंगी और जोखिम भरी प्रक्रिया मानी जाती है। खासकर प्री-क्लिनिकल स्टेज में कई संभावित दवाएं समय, पूंजी और वैज्ञानिक अनिश्चितताओं के कारण आगे नहीं बढ़ पातीं।

Peptris का मानना है कि AI के जरिए इस शुरुआती चरण में ही संभावित जोखिमों की पहचान कर ली जाए तो फेलियर रेट को कम किया जा सकता है। इससे फार्मा कंपनियों को बेहतर और तेज निर्णय लेने में मदद मिलती है।


🔬 AI से मिल रही बढ़त

Peptris का प्लेटफॉर्म सिर्फ नए molecules तैयार नहीं करता, बल्कि यह यह भी अनुमान लगाता है कि कोई दवा शरीर में कैसे काम करेगी, उसके संभावित साइड इफेक्ट्स क्या हो सकते हैं और उसकी सफलता की संभावना कितनी है।

इस डेटा-ड्रिवन अप्रोच से कंपनी को कई NCE प्रोग्राम्स को आगे बढ़ाने में मदद मिली है। कुछ प्रोग्राम अब क्लिनिकल डेवलपमेंट की दिशा में बढ़ रहे हैं।


📈 अगले 24 महीनों की योजना

कंपनी आने वाले दो वर्षों में:

  • कई नए NCE प्रोग्राम्स शुरू करेगी
  • Drug repurposing और rescue प्रोग्राम्स पर काम करेगी
  • अन्य कंपनियों द्वारा छोड़ी गई क्लिनिकल स्टेज दवाओं को फिर से विकसित करेगी

यह रणनीति न केवल समय बचाती है बल्कि पहले से किए गए रिसर्च और निवेश का बेहतर उपयोग भी सुनिश्चित करती है।


🤝 B2B मॉडल पर काम

Peptris का बिज़नेस मॉडल B2B है। यानी कंपनी सीधे उपभोक्ताओं को दवा नहीं बेचती, बल्कि फार्मा, बायोटेक और चुनिंदा FMCG कंपनियों के साथ मिलकर काम करती है। यह लाइसेंसिंग और को-डेवलपमेंट मॉडल के तहत अपने एसेट्स और तकनीक उपलब्ध कराती है।

इससे कंपनी को राजस्व के साथ-साथ रिसर्च सहयोग भी मिलता है।


🏥 किन क्षेत्रों पर फोकस?

Peptris का फोकस उन चिकित्सीय क्षेत्रों पर है जहां आज भी बड़ी unmet medical needs मौजूद हैं। इनमें शामिल हैं:

  • Rare diseases
  • Inflammation
  • Oncology (कैंसर)
  • Women’s health

इन क्षेत्रों में नई और प्रभावी दवाओं की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।


🌍 हेल्थकेयर सेक्टर के लिए क्या मायने?

AI आधारित ड्रग डिस्कवरी मॉडल हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए गेमचेंजर साबित हो सकते हैं। पारंपरिक ड्रग डेवलपमेंट में जहां 10–15 साल और अरबों डॉलर खर्च हो जाते हैं, वहीं AI इस प्रक्रिया को काफी हद तक तेज और सस्ता बना सकता है।

Peptris का यह निवेश दर्शाता है कि भारतीय स्टार्टअप्स अब ग्लोबल हेल्थकेयर चुनौतियों को हल करने की दिशा में भी मजबूत कदम उठा रहे हैं।


🏁 निष्कर्ष

₹70 करोड़ की Series A फंडिंग के साथ Peptris अब अपने AI-आधारित ड्रग डिस्कवरी प्लेटफॉर्म को अगले स्तर पर ले जाने की तैयारी में है। क्लिनिकल रेडीनेस की दिशा में बढ़ते प्रोग्राम्स और नई पाइपलाइन इस बात का संकेत हैं कि कंपनी दीर्घकालिक प्रभाव डालने की योजना बना रही है।

ड्रग डेवलपमेंट की जटिल दुनिया में जहां असफलता की दर बहुत अधिक है, वहां AI और डेटा साइंस आधारित अप्रोच नई उम्मीद जगा रही है। आने वाले वर्षों में Peptris का प्रदर्शन इस बात को तय करेगा कि भारत से उभर रही यह तकनीक वैश्विक हेल्थकेयर पर कितना प्रभाव डाल पाती है।

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